स्त्री /Stri Hindi Ghazal
दर्द बहुत सभाले है मैंने सोचा था बड़े होकर कुछ बन कर दिखाउंगी दिन रात एक करके कुछ दुनिया में नाम कर जाऊगी लेकिन क्या बताऊ बड़े होते ही माँ बाप ने कर दी परायी अपने उन चाँद आसुओ के साथ कर दी मेरी बिदाई सोचा कैसे सब कुछ सह पाउगी माँ बाप की ये जुदाई सब कुछ यहाँ का बहुत याद आएगा माँ के हाथ का खाना और मिढ़ाई भूलूंगी मैं कैसे अपनी किताबे और अपना भाई अपनी बहन के साथ वोह खट्टी मीठी लड़ाई लो अब एक पल में मैं तो हो गयी परायी जिसने इतने दिन दिल से इतने मेहनत से पाला मुझको आज उसी ने एक पल में मुझको कर दिया परायी !! दर्द बहुत सभाले है मैंने मेरा नाम है स्त्री !! मानो तो मैं माँ हु मानो तो बहन मानो तो अच्छी दोस्त मानो तो आपकी अर्धांगिनी !! लेकिन क्या कहु किससे कहु दर्द अपना मैं दर्द बहुत सभाले है मैंने मेरा नाम है स्त्री !!
